तमन्ना (भाग- १३)

कहानी 

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तमन्ना 

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(भाग-१३) 
प्रभा देवी लड़खड़ाने लगीं पर साथ ही अनुराग ने उन्हें सम्भाल लिया और धीरे से उनका सिर  सोफे की बैक से टिका दिया। अनुराग जल्दी से किचन से पानी लाकर प्रभा देवी के सामने खड़ा हो गया और उनके हाथ में पानी का ग्लास थमा दिया और वो पानी पीने लगीं। 

“तुम्हारे इसी अपनेपन की वजह से.. कभी तुमको बेवजह घर आनें से रोक नहीं पाई। अपने देवेश से ज्यादा तुम्हें सुख दुःख में याद किया। हम रावत और तुम शर्मा.. क्या मेल है हमारा। रिश्तेदार बोलेंगे की प्रभा… क्या तुम्हें ठाकुर खानदान में लड़कों की कमीं पड़ गई थी?? वैसे भी आस-पड़ोस मुहल्ले वाले, नातेदार क्या बोलेंगे???? ”

  अनुराग ने धीरे से खाली ग्लास ले लिया,” तुम अनुष्का के देखो तो भाई लगोगे….पहले हम अपने पड़ोस के लड़के को भी भाई कहा करते थे.. “प्रभा देवी  ने उसे संस्कारों की दुहाई देते हुए उसे देखा और उसके उत्तर की प्रतीक्षा करने लगी। 

” देखो माँ, (प्रभा देवी ने उसकी ओर क्रोधित होकर देखा) मैं माँ इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ये मेरे दिल की आवाज़ है और मैं अब दुनियादारी, समाज, रिश्तेदारी नहीं देखुंगा.. मैं ये अनमोल रिश्ते खोना नहीं चाहता। बचपन तो हमारा अपना था पर…. उन्हें संस्कार और रीति-रिवाजों में मत बाधों  माँ, जब मैं पांच साल का था, हम क्या जानते थे..??  हम हंसते – खेलते थे, आप भी हमारे साथ हंसती थीं तो हम वैसे ही क्यों नहीं जी सकते, इस जीवन का मोल मुझे आज पता चला  है .. जब अनुष्का पर गर्म तेल गिरा माँ, जब जीवन ही नहीं होगा तो आप किसे बन्धन से बांधोंगी … आप तो माँ हैं.. कहते हैं कि माँ मन की भी बातें जान लेती है। तो आप.. अनुष्का के मन की बात क्यों नहीं समझीं??…..वो तो खुली किताब है।  जब खुश होती है तो ख़ुशबू की तरह महक जाती है और जब उदास होती है तो सूखे पत्ते की तरह टूट जाती है और एक हल्का सा हवा का झोंका भी उसके मन को चोट पहुंच जाता है ”

प्रभा देवी ने कहा कि,” बस करो!….. तुम आधुनिकता में अँधे हो गए हो। भाई-बहन के रिश्ते और समाज से तुम्हे क्या लेना, यहां रहुंगी तो मैं…ना। (उनका गला रूंध गया) एक वहां मेरी छोटी बेटी तृप्ति किसी एनआरआई से शादी कर रही है।  चलो वो तो दूर है लेकिन… यहां मैं किस- किस को जवाब देती फिरुंगी।अन्नू को तो सब जानते हैं। मेरी  भी मजबूरी समझो.. “और फफक कर रो पड़ीं।अनुराग को प्रभा देवी पर तरस सा आने लगा, वो जिस सांचे में ढाली गईं थीं। शायद वो उसके प्यार को कभी ना समझ पातीं। इतने सालों बाद क्या माँ खुद को कभी बदल पायेंगी, क्या इस तेज आंधी में वो खुद को  सम्भाल पायेगीं। अनुराग दुविधा की स्थिति में चला गया था कि तभी अनुष्का के कमरे से…. 
क्रमशः 
श्वेता भारद्वाज (१३/८/२०१७)

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क्या अनुराग प्रभा देवी को समझा पायेगा? क्या प्रभा देवी उनके रिश्ते को अपना पायेगी? आपके शुभकामनाओं की अपेक्षा साथ ही सादर नमन 🙏🙏

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तमन्ना (भाग – १२)


कहानी 

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तमन्ना 

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(भाग- १२)
अनुराग भागता हुआ दवायें लेकर आया। डॉक्टर साहब ने इंजेक्शन लगाया, ड्रिप चढ़ा दी गई, मलहम दे दिया लगाने को। अनुराग हाथों में मलहम लिए खड़ा था की तभी डॉक्टर ने कहा कि, “देखो अनुराग! ड्रिप जब पूरी चढ़ जाये तो इस गोल वाले बटन को उपर की तरफ घुमा देना, ये फिर बन्द हो जायेगी और हाँ.. जब तक ड्रिप चढ़ेगाी तब- तक इसे कुछ खाने को मत देना। ये मलहम है.. एक-एक घंटे  के अन्तराल में लगा लगा दिया करना।” डॉक्टर साहब यह कहकर जाने लगे की तभी अनुराग ने फिर रोक लिया, “जब ड्रिप चढ़ जाये तब अगर अन्नू कुछ खाने को मांगे तो..????  यह कहकर  अनुराग प्रश्न पूछती नजरों  से देखने लगा। तब डॉक्टर ने मुस्कराते हुए कहा कि, ‘” अभी उसे लिक्विड ही खिलाना है। अगर  शाम तक जलन और दर्द कम ना हुआ तो फोन कर देना मै एम्बुलेंस भिजवा दुंगा। ” आभार भरी दृष्टि से देखते हुए अनुराग की आँखें भर आईं,  डॉक्टर साहब ने जाते-जाते सारी बातें प्रभा देवी से बोलते गये। अनुराग डॉक्टर साहब को दरवाजे तक छोड़ने आया। जाते – जाते डॉक्टर साहब ने अनुराग से कहा,” देखो ये तुम्हारे घर का मामला है लेकिन मैं कुछ पूछना चाहता था… “थोड़ा झिझकते हुए कहा।, ” अरे डॉक्टर साहब! मैं आपके बच्चे जैसा ही तो हूँ बोलिये..” डॉक्टर साहब ने कहना शुरू किया, “देखो, गर्म तेल की वजह से उसका वो काफी जल गई है, जलने से ज्यादा घाव मन पे… पड़े घाव  का दर्द होता है,… तुम्हारे प्यार की परीक्षा अब शुरू हुई है। मैंने तुम्हें अनुष्का के लिए भावुक होते देखा। मुझे अनुष्का को देखकर मुझे मेरी बेटी की यादें ताजा हो गई। वो भी  हसतीं – मुस्कुराती एक फूल की तरह ही थी। लेकिन उस फूल को किसी की बुरी नज़र लगा गई और झुलसा दिया… जला दिया… जिससे वो प्यार करती थी उसने भी कुछ समय बाद उसे छोड़ दिया और मेरी आभा  जिन्दगी से हार गई….उसने सुसाइड कर लिया…..  मैं उसे बचा नहीं पाया….. मेरे पास सिर्फ एक ही बेटी थी। जानता हूँ कि मैं स्वार्थी हूँ पर किसी जली हुई आभा जैसी बेटी को देखता हूँ तो …” उनका गला भर्रा गया और  आगे कुछ भी ना बोल पाये। खामोशी सी छा गई। अनुराग ने विश्वास के साथ हाथ पकड़ लिया और डॉक्टर साहब को गले से लगा लिया। कुछ बातें करने के पश्चात डॉक्टर साहब चले गए। अभी जल्दी  ही डॉक्टर साहब इस कॉलोनी में शिफ्ट हुए थे। कुछ देर बाद अनुराग, अनुष्का के कमरे की तरफ चल दिया।”रूक जाओ! कहाँ जा रहे हो? “प्रभा देवी की तेज आवाज से वो चौंक गया था।” अनुराग वैसे ही अनुष्का के दु़:ख में इतना दु:खी था की उसे याद ही ना रहा कि उसकी देखभाल, उसकी हद से ज्यादा संवेदनशीलता उसे प्रभा देवी की नजरों में दोषी बना कर… खड़ा कर देगा। “अनुराग तुम्हें मैने बेटे जैसा माना और तुमने मेरे पीठ पीछे, मेरी ही बेटी के साथ प्यार – मुहब्बत के खेल रहे हो….छी… मुझे सोच कर ही.. कैसा लगा रहा है इसे मैं शब्द नहीं दे सकती.. ”  और प्रभा देवी ने घृणा भरी दृष्टि अनुराग पर डाली। गुस्से में प्रभा देवी का चेहरा अग्नि की भांति दहकने लगा। अनुराग ने कुछ नहीं कहा, बस  उनको बेबस होकर देखने लगा.. जैसे उसके हाथों  में कुछ भी ना हो।  वो धीरे-धीरे चलता हुआ… प्रभा देवी के पास आ गया, उनके पावों को छूकर और नजरें नीची किये घुटने के बल बैठ गया। प्रभा देवी ने गुस्से में आकर अनुराग पर थप्पड़ो की बरसात कर दी। वह अनुराग को जाने कब तक मारती रहीं और मारते मारते अचानक…….. 
श्वेता भारद्वाज (१२/८/२०१७)

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अनुराग के प्यार की परिणति क्या होगी?? प्रभा देवी अब क्या करेंगी?? आपकी शुभकामनाओ की अपेक्षा के साथ सादर नमन 🙏🙏🙏🙏💐

कहानी- तमन्ना (भाग – ११)

कहानी 

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तमन्ना 

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(भाग – ११)
किचन में धड़ाम की आवाज़ के साथ ही साथ अनुराग के जोर से अनुष्का  चिल्लाने की आवाज़ गूंज उठी। किचन में कड़ाही का तेल अनुष्का के उपर गिर गया था। मानो अनुराग पागल हो उठा था। वह उसे अपनी गोद में उठाये बेडरूम की तरफ भागा… पीछे – पीछे अनुष्का की मांँ और उनकी सहेली संगीता.. सभी  परिस्थितियां  समझने का प्रयास कर रहे थे। आनन-फानन में अनुराग बगल वाले डाक्टर साहब को बुला लाया, सुबह वक्त था इतनी सुबह डाक्टर मिलना भी कठिन था। प्रभा देवी तो बस रोये जा रहीं थीं, “मैंने नाहक ही कह दिया कि छोले-बठूरे बना दे, ना बनाती, ना जलती।” 

   अनुराग, अनुष्का के सिरहाने बैठा था और बेचैनीं में रह – रह के उसके हाथों को पकड़ लेता।  जो सामने खड़ी संगीता जी के गले से उपर जा रहा था। उधर फूट-फूट कर रोती हुई प्रभा जी को अपनी कराहती हुई बेटी के दु:ख के सिवा कुछ  नज़र नहीं आ रहा था। गले और हाथ बुरी तरह जल गये थे। जलन और दर्द ने बेहाल कर रखा था अनुष्का को। थोड़ी-बहुत छींटे अनुष्का के चेहरे पर भी आयीं थीं । डॉक्टर साहब ने तुरंत ही कुछ दवायें और इंजेक्शन्स लाने के लिए कहा। अनुराग एक झटके से बिना प्रभा जी से पैसे लिए बाहर चला गया। 

  लेकिन शायद बाईक की चाभी अन्दर ही रह गई थी, वो जैसे ही घर के अन्दर जाने के लिए मुड़ा, सामने संगीता जी चाभी लिए खड़ीं थीं।चेहरा भावशून्य था और उन्होंने हाथ बढ़ाकर कहा, “शायद ये तुम्हारी चाभी है।” अनुराग ने  कृतज्ञता के भाव के साथ चाभी ले लिया। अनुराग ने बाइक में चाभी लगायी और हवा से बातें करते हुए दूर कहीं संगीता जी के नजरों से ओझल हो गया। वह वहीं अनेक सवालों के साथ ही किंकर्त्वयविमूढ़ सी खड़ीं रहीं कि तभी रजनीश के फोन ने उन्हें वर्तमान में ला पटका, “हेलो माँ! बात हुई तुम्हारी आंटी से..?? (फोन उठाते ही रजनीश ने सवाल कर डाला)” संगीता जी ने दबी आवाज़ में कहा, “अभी नहीं… और मुझे लगता भी नहीं की कुछ हो पायेगा। तुम अनुष्का और मार्केट में अपना शोरूम खोलने का सपना देखना बन्द ही कर दो। (संगीता जी ने  सारी ख़ीझ रजनीश पर निकालते हुए बोलीं) अब रखो फोन…” यह कहते हुए संगीता जी ने मोबाइल अपने पर्स में भी रख लिया। प्रभा जी का मेन मार्केट में बड़ी जमींन थी जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था। 

     प्रभा जी भागती हुई आईं, “अरे संगीता जाने क्या किस्मत लेके आई है मेरी बड़ी बेटी अनुष्का।  इतना सुन्दर चेहरा था जिससे शायद उसकी किस्मत संवर सकती थी।… (आँखों से आँसू पोंछते हुए बोलीं)। दर्द से बेहाल है मेरी बेटी। चलो तुमने ठीक से पानी भी नहीं पिया है। आओ चलो बैठो तुम्हारे लिए चाय बना दूँ। इतने सालों में तुमने पूछा तो सही और जो इतना बड़ा अहसान…..”प्रभा जी ने संगीता का हाथ पकड़ते हुए कहा। लेकिन संगीता ने बात बीच में ही काट दी और कहा कि, 

” अरे नहीं प्रभा तुम ये सब छोड़ो, पहले जाओ अपनी बेटी को देखो।  अन्दर डॉक्टर साहब अकेले होंगे जाओ!! वैसे भी तुम्हारे घुटने में दर्द रहता है। अब मैं इतनी भी स्वार्थी नहीं.. (धीरे से प्रभा का हाथ दबाते हुए संगीता जी ने कहा ) देखो!! घर से लगातार फोन आ रहा है, अब मुझे चलना चाहिए। घर जाकर बात करतीं हूँ तुमसे कि आगे क्या करना है…… ”

यह कहते हुए संगीता जी प्रभा से गले मिलकर चल दीं, प्रभा उनको जाते हुए देखतीं रहीं। पर संगीता ने दोबारा मुड़कर नहीं देखा, कुछ देर बाद वो नज़रों से ओझल सी हो गई। जाते – जाते उसके कहे शब्द  कि आगे क्या करना  है…. ???? ने प्रभा जी को उलझा दिया था। इसे बस एक दिमाग़ी फितूर समझ कर प्रभा ने आती नकारात्मक सोच को सिरे से ही ख़ारिज कर दिया और अंदर चली गईं। 

”  अनुराग… मे..रा..हाथ..म..त..छोड़.. “अनुष्का की कराहती आवाज़ ने प्रभा देवी को जैसे किसी ने  अनन्त  गहरी  काली खाई में ढकेल दिया हो। दिमाग़ में जैसे बवंडर से चलने लगे। उफ्फफफ!!! ये क्या कर दिया तुमने… प्रभा को लगा जैसे जलते तेल को  उसके सीने पर किसी ने एक साथ उड़ेल दिया हों ……. 
क्रमशः 
श्वेता भारद्वाज (११/८/२०१७)

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प्रभा देवी को जब यह सच पता चला तो उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी?? अब अनुराग क्या करेगा?? आपकी शुभकामनाओ की अपेक्षा के साथ सादर नमन 🙏💐💐💐

कहानी – तमन्ना (भाग – १०)

कहानी 

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तमन्ना 

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(भाग-१०)
अनुष्का ने जैसे ही  किचन में कदम रखा पीछे – पीछे प्रभा  देवी(अनुष्का की माँ) भी चली आई। अनुष्का ने मुड़ कर माँ की तरफ देखा, “कुछ चाहिए माँ?” प्रभा देवी ने पलट कर जवाब दिया, “क्यूँ.. क्या ये मेरा घर नहीं है? अच्छा सुनों! आज सुबह के नाश्ते में छोले – बठूरे, जलेबी.. अरे नहीं वो तो अनुराग से बोल दिये हैं वो शर्मा  जी का बेटा कल ही तो आया है शाम को और दही की लस्सी बना देना..” 

“लेकिन दही तो नहीं है माँ.. “अनुष्का ने बताया। प्रभा देवी ने बात काटते हुए कहा – क्यूँ नहीं है.. अभी कल ही  रात में दूध में जोरन डाला है  तुम्हें कैसे पता होगा.. तुम जब पूरी रात छत पर ही गुज़ार दोगी (प्रभा देवी ने घूर कर देखा)” अनुष्का माँ की नज़रों से बचने के लिए उनकी ओर पीठ करके खड़ी हो गई। पर माँ की पैनी नज़र से  कौन बच पाया है.?” कोई नहीं.. , “.. और छत पर.. कोई था..???” अनुष्का को काटो तो खून नहीं वाली स्थिति हो गई थी, “न. न.नही माँ.. मैं अकेली ही थी और कौन होगा मेरे साथ ..” 

 “तुम्हारे कमरे में आई तो तुम थी ही नहीं, जानतीं हो मुझे घुटने की प्रॉब्लम होती है, लेकिन भाग – भाग कर छत पर ही जाना है तुमको…” माँ ने शिकायती लहज़े में कहा। 

“नहीं माँ फूल – पौधे को पानी देना रहता है बस इसी वजह से.. “अनुष्का ने नज़रें चुराते हुए कहा। 

प्रभा देवी जाने लगीं कि तभी अनुष्का ने दोबारा बोला, माँ छोले के चने कहाँ भिगो कर रखें हैं??” माँ ने गैस – चूल्हे के पास इशारा किया। मैं फिर मुस्कुरा कर काम करने लगी।कुछ देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई.. माँ ने ही दरवाजे को खोला। अनुराग हाथों में जलेबी लिए खड़ा था।” जा.. जाके किचन में रख दे बेटा! “माँ ने डांटते हुए कहा। अनुराग दबे पांव किचन में जाके अनुष्का के पीछे खड़ा हो गया। अनुराग ने धीरे से अनुष्का के कानों में सरग़ोशी की – तुम हुस्न हो इस चांद का

                   या चांद तेरा हुस्न है

                  बिख़रे से हमख़्याल तेरे 

                   ये संवर जाये तो ज़ुल्फ हैं। 

अनुष्का चौंक सी गई, पर पलट के अपने इश्क को नजर भर के देख ना सकी। अनुराग  उसकी कमर के इर्द – गिर्द अपने इश्क का घेरा बना ही रहा था कि तभी प्रभा देवी की ख़ुशी से थिरकती आवाज़ दोनों के कानों में पड़ी “आइए – आइए.. बेटा अन्नू! जरा देखो तो कौन आया है?? ” अरे  प्रभा जी! आप शान्ति से  बैठिये..अभी अभी तो मैं आई हूँ। ” संगीता (प्रभा देवी की सहेली) ने खींच कर प्रभा को पास बैठा लिया। 

” अरे नहीं नहीं!! तुम मेरे घर आकर मेरी बेटी का हाथ मांगने आई हो इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है ”

   इधर  अनुष्का और अनुराग के प्यार पर जैसे तुसारापात  हो गया था। जो बर्फ की असंख्य नुकीली सुइयों की तरह चुभ कर पीड़ा दे रहे थे। प्रभा देवी की आवाज़ सन्नाटे को बींधती सुनाई पड़ी -” अनुराग बेटा!  ज़रा सरोज के


 लिए पानी तो लेकर आओ! ये कैसा न्याय था ईश्वर का.. जिसकी मैं पूरी हो गई , तन से, मन से, समर्पण से,…. उसी को ईश्वर मुझसे छीन रहा है।  अचानक अनुष्का के आँखों के आगे अंधेरा सा छाने लगा और एक जलती हुई आग ने उसे लपेट लिया,वह कुछ कहना चाहती है, ये आग उसके जीवन को ना बर्बाद कर दे उसे कदम उठाना ही था कि वह… एक अन्धेरी गुफा में गिरती जा रही थी। अनुराग तुम तो हाथ बढ़ाओ….. और एक सन्नाटा…… 
श्वेता भारद्वाज (१०/८/२०१७)

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आगे की कहानी में अनुष्का के जीवन में क्या घटनाक्रम होते हैं?? शुभकामनाओं की अपेक्षा साथ सादर नमन 🙏🙏🙏🙏

यूँ ही

जा मुझे दुश्वारियों में ना डाल 

फिर मुझे तन्हाइयों में ना डाल 

तड़पे हैं सालों ख़ुद के टूट  जाने पर

जा  फिर मुझे आज़ाबों में ना डाल 

 वो बेरूख़ी वो  हद ए बेज़ारियाँ 

 लौट के फिर मुझे आज़माइशों में ना डाल 

लहुलुहान हूँ दफ़्न किंरचें निकालकर 

जा फिर दर्द की तकलीफों  में ना डाल 

सफेदपोश़ तुम औ तिरे लिबास भी हैं सफेद 

अपनी कारस्तानियों पे ग़ोया पर्दे तू ना डाल 

जाओ मैंने चुन लिए हैं ख़ुदा के सच्चे  रास्तें

मेरी तय इरादों को यूंँ  गफ़लतों  में ना डाल। 

श्वेता भारद्वाज (6/9/2017) 

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मुग़ालतें 

इश़्क  में मुगालते पालनें का चलन  जो  चला 

आदत ये कैसी उफ्फ बेरहम यूँ चला 

फ़ितरत बदली है जबसे मुहब्बत की 

आश़िक ग़ैरों में ढूंढता मरहम सा मिला 

महबूब होकर भी तिश्नग़ी हैं समन्दर सी

आज हमदम ही है बेवफा सी राहों में मिला 

उसे इश्क़े इबादत होकर रूह तक जाना था ऐ ‘श्वेत’ 

ख़ुदाया जिस्म की गलियों में रूह को तलाशता सा मिला 

श्वेता भारद्वाज (5/9/2017) 

कहानी तमन्ना (भाग ९)

कहानी 

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तमन्ना 

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(भाग – ९)
जिन्दगी को महका सा दिया था। अनुराग ने मेरी सोच और पूर्वाग्रह को झुठला दिया था। ठिठुरती ठंड में हम हाथों को हाथ में लिए जाने कब तक यूं ही बैठे रहे। रह रह कर आती ठंडी हवाओं नें हमारे प्यार के अहसासों को ठंडा नहीं होने दिया था। स्वयं के सीने पर रखें मेरे  सिर को  अनुराग ने  सनेह चूम लिया था। मद्धम आंच में जलती हमारी ख्वाहिशों को जैसे पंख लग गए थे।अनुराग ने कहा कि, “मैं तुम्हारी होंठों के उपर इस काले तिल का आशिक हूँ अन्नू!तुम्हारा यह समर्पण मेरे जीवन की अमूल्य निधि है” अन्नू  ने ग़ुम सी आवाज में कहा,  “और.. ये मेरे अस्तित्व का गुमान और मेरा विश्वास सौंप दिया तुम्हें.. इस  धरोहर को देने के बाद मेरे पास अब कुछ भी शेष नहीं… शेष रहा तो तुम.. तुम्हारा प्यार… मेरे विश्वास को कभी मत छलना..।” 

अनुष्का, अनुराग के सीने से लगी ख्वाबों की हसीन वादियों में चली गई। अनुराग ने उसे अपने जैकेट के अन्दर समेट सा लिया, छुईमुई सी तो थी वह,  अनुराग ने झुक कर कान में सरग़ोशियां सी की…. तो अनुष्का ने शर्मा कर अपना मुँह झट से अनुराग की जैकेट में छुपा लिया । 
बेहद सी,

 ना हद थी इस  इंतजार की । 

इन बेलग़ाम सासों को,

 तिरे रूख़सार से गुज़रना जो था। 

मेरे महबूब, 

तुझे पाने की ख्वाहिशों का क्या। 

मुझे तेरे साथ ही, 

इन चांदनी रातों में जलना जो था। 
रात भर चलती हवाओं ने ठंड को और भी बढ़ा दिया था।  भोर की  की लालिमा ने तो अनुष्का के चेहरे को और दिव्य बना दिया था। मृगनयनी सी आँखें और उसपर पलकों की लम्बी झालर,चौड़ा मत्था, गहरे भूरे रंग के बाल जो अनुष्का के गुलाबी चेहरे को चूम कर छुप जाते कहीं, शान्त सोयी अनुष्का के माथे को चूमते हुए अनुराग ने धीरे से अपनी जैकेट अनुष्का को उढ़ा दी कहा, “मैं जल्दी ही आऊंगा।” और और वो चला गया। 

       अनुष्का की अचानक नींद टूटी तो अनुराग को ना पाकर वो घबरा सी गई। ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!! “ये क्या कर डाला मैंनें। मैं खुद को रोक क्यूँ ना सकी। उफ्फ!! अनुराग …  

ये सच था कि मुझे शादी जैसे बन्धन में विश्वास ही नहीं था। मेरा मानना था कि शादी मात्र समझौता है जिसे हम अपनो के दबाव में स्वीकृति प्रदान करतें है। यह प्रतिभा के विकास में बाधक है। जिसे पुरूष अपने अहम मात्र की संतुष्टि के लिए अर्धांगिनी के प्रतिभा को तिलांजलि देने में भी संकोच नहीं करता। वरन् गर्व महसूस करता है। वह सर्वश्रेष्ठ बने रहने के आगे विवश होता है यही मैंने अपने आस-पास देखा था। मुझे दु:ख था कि मुझसे मेरा बचपन बहुत जल्दी छीना जा रहा था। 

       मैं थके कदमों से नीचे चल पड़ी। मांँ अभी भी गहरी नींद में सोई थीं। मैंने जल्दी-जल्दी किचन साफ करना शुरू किया। चाय का पैन गैस पर चढ़ा दिया और अदरक कूटते हुए जाने कितनी बार उस घड़ी को कोस चुकी थी। चाय छानते हुए मैंने माँ को जगा दिया था। बाथरूम से आती आवाज़ों से पता चला कि मांँ नहा रहीं हैं। मैं माँ के कपड़े निकाल कर उनके कमरे में रख आई और चाय लेकर अपने कमरे में आ गई।खिड़की पर बैठी गौरैया का चहचहाना दिल को सुकून सा दे रहा था। 

     “अन्नू  बेटा!! जरा चाय देना..” मांँ की आवाज़ सुनाई पड़ी। मैं मांँ को चाय – नाश्ता देने के लिए किचन की तरफ चल पड़ी। 
  क्रमशः 
श्वेता भारद्वाज (९/८/२०१७)

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अनुष्का के जीवन में घटी घटना क्या नया मोड़ लायेगी कहानी में? आपकी शुभकामनाओ की अपेक्षा के साथ सादर नमन 🙏🙏💐